शिष्यत्व की श्रेष्ठता (यूहन्ना १३:३४–३५)

शिष्यत्व की श्रेष्ठता (यूहन्ना १३:३४–३५)
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प्रभु की स्तुति

शिष्यत्व की श्रेष्ठता

मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूँ, कि तुम एक-दूसरे से प्रेम रखो; जैसा मैंने तुमसे प्रेम किया है, वैसा ही तुम भी एक-दूसरे से प्रेम रखो। यदि तुम आपस में प्रेम रखोगे तो इसी से सब जानेंगे कि तुम मेरे चेले हो।” (यूहन्ना १३:३४–३५)

यीशु हमसे कहता है कि सब लोग जानें कि हम यीशु के चेले हैं, इसके लिए हमें एक-दूसरे से प्रेम करना चाहिए। यह किस प्रकार का प्रेम है, इसे स्पष्ट करने के लिए यीशु याद दिलाता है कि जैसा उसने हमसे प्रेम किया है, वैसा ही हमें भी एक-दूसरे से प्रेम करना चाहिए। अर्थात, केवल मनुष्यिक स्तर पर प्रेम करना पर्याप्त नहीं है; हमें उसी प्रकार प्रेम करना है जैसा यीशु ने किया।

मनुष्यिक प्रेम के बारे में (मत्ती 5:43, 46, 47) में लिखा है कि मनुष्य प्रेम करने वालों से ही प्रेम करते हैं और शत्रुओं से बैर रखते हैं। यह कर वसूलने वाले और अन्य जातियों की स्थिति है। परन्तु हमें इस प्रकार का प्रेम नहीं करना है। हमें वैसा ही प्रेम करना है जैसा यीशु ने हमसे किया और (यूहन्ना 15:9) जैसे पिता ने यीशु से प्रेम किया, वैसे ही यीशु ने हमसे किया। इसलिए उसी परमेश्वर के प्रेम के अनुसार हमें एक-दूसरे से प्रेम करना चाहिए।

(लूका 6:27–35.) में यीशु स्पष्ट करता है कि परमेश्वर ने हम से कैसा प्रेम किया है। (लूका 6:35,, मत्ती
5:44–45)
परमेश्वर अकृतज्ञों और दुष्टों पर भी दयालु है; वह दुष्टों और भले लोगों पर अपना सूर्य उदय करता है और धर्मियों अधर्मियों पर वर्षा करता है। अतः हमें अपने शत्रुओं से भी प्रेम करना है। (लूका
6:27–28)
प्रेम का क्रिया के रूप से बैर करने वालों के लिए भला करना, शाप देने वालों को आशीष देना, और सताने वालों के लिए प्रार्थना करना। (मत्ती 5:44),) यदि कोई गाल पर मारे तो दूसरा गाल भी फेरना, वस्त्र लेने वाले को चादर भी देना, मांगने वाले को देना, छीनने वाले से वापस मांगना (लूका 6:29–35)

इसी प्रकार हम भले कार्य करते हुए, अपने शत्रुओं तक से प्रेम करें, ताकि स्वर्गीय पिता की सन्तान कहलाएँ। (रोमियों 5:6–10) परमेश्वर ने अपना प्रेम इस प्रकार प्रकट किया कि जब हम निर्बल, पापी और शत्रु थे, तब उसने हमें प्रेम किया। इसलिए हमें केवल प्रेम करने वालों से नहीं, बल्कि शत्रुओं, बैर करने वालों और सताने वालों और समशीत में सब से प्रेम रखना चाहिए।

परमेश्वर के प्रेम की एक और विशेषता यह है कि मनुष्यिक प्रेम अस्थायी होता है। जब तक कोई भला है तब तक प्रेम रहता है; परन्तु यदि वह शत्रु बन जाए तो प्रेम समाप्त हो जाता है। किन्तु परमेश्वर का प्रेम कभी नहीं बदलता चाहे वेः भला हो या बुरा। (1 कुरिन्थियों 13:8) परमेश्वर का प्रेम कभी समाप्त नहीं होता; यह सदा बना रहता है। इसीलिए परमेश्वर का प्रेम जैसे यीशु ने प्रेम किया वैसे अंत तक प्रेम करना है। (यूहन्ना 13:1)

यीशु ने अपने लोगो को इस संसार में रहते समय अंत तक प्रेम किया।  यह कैसे हो सकता है या कैसे यीशु ने प्रगट किया यह ध्यान करने से हमें अद्भुत लगेगा।  वेः दुनिया छोड़ कर पिता के पास जाने का समय गया यह समझकर अपने प्रेम रखने वालो से अनंत प्रेम करता हु यह बताने के लिए भोज में से उठ कर  (यूहन्ना 13:1, 3–5) अपने वस्त्र उतारकर, कमर में तौलिया बाँधकर, पानी लेकर चेलों के पाँव धोए और तौलिये से पोंछे। यह दास का कार्य था।

यह कार्य को ध्यान करने से दाऊद की पत्नी बन ने के लिए आई हुई अबीगैल कहती है (1 शमूएल 25:40–41) " देख में अपने दासों की पाँव धोने वाली दासी। हो सकता है की स्वामी के पाँव धोने के लिए बहुत लोग होंगे पर स्वामी के दासो का पाँव धोने की दीनता से वह कहती है। यीशु ने केवल अपने चेलों का ही नहीं बल्कि गुरु और प्रभु कहने वाले दासों का पाँव धोने वाला एक दास बन गया। (फिलिप्पियों 2:6–7) परमेश्वर के स्वरूप में होते हुए भी उसने अपने को दास का रूप दिया और दीन बना।

जैसा (निर्गमन 21:1–6) में लिखा है, यदि कोई इब्रानी दास कहे की वह अपने स्वामी और उनके परिवार से प्रेम करता है, तो वह स्वामी उसके कान में सुथारी से छेद डाले और वह आजीवन दास बना रहता है। वह दास स्वतंत्र होकर अपने लिए पत्नी और बचे कमा सकता था फिर भी वह स्वामी ने दिए हुए अपने पत्नी और बच्चो के लिए दास बन कर रह जाता है। उसी प्रकार यीशु ने पिता से जो लोग पाए, उनसे अन्त तक प्रेम किया और उनके लिए दास बना। (यूहन्ना 6:37–39, 10:27–29) उसने उनका पाँव धोया। (यूहन्ना 13:1)

इसलिए यदि हमें भी अन्त तक प्रेम करना है तो हमें भी एक-दूसरे के दास बनना होगा।

(यूहन्ना 15:12,) जैसा यीशु ने हमें प्रेम किया, वैसा ही हमें भी एक-दूसरे से प्रेम करना चाहिए। (यूहन्ना
15:9–10,)
जैसे यीशु पिता की आज्ञाओं को मानकर उसके प्रेम में बना रहा, वैसे ही हमें यीशु की आज्ञाओं को मानकर उसके प्रेम में बने रहना है। (यूहन्ना 14:15, 21, 23, 24; 15:14)

(फिलिप्पियों 2:6–8) यीशु ने अपने पिता की आज्ञाओं को मानने और उसकी हर आज्ञा का पालन करने के लिए एक सेवक का रूप धारण किया, यहाँ तक कि अंत तक, क्रूस पर कि  मृत्यु तक। जब हम (भजन संहिता 40:6–8) और (इब्रानियों 10:5–7) को देखते हैं, तो हम देखते हैं कि परमेश्वर बलिदान और भेंट नहीं चाहता था, बल्कि वह चाहता था जैसे इब्रानियों के लिए पत्र में लिखा है कि जो उसकी इच्छा पूरी करने आएं, जैसा कि पुस्तक में उसके विषय में लिखा है कि यीशु के लिए एक शरीर तैयार किया गया था, जो परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए प्रिय था, जबकी भजन संहिता में कहा गया है कि परमेश्वर ने उसके कान छेदे थे। अर्थात्, यीशु, जो परमेश्वर की आज्ञाओं को मानने के लिए मानव रूप में आया, उसने स्वयं को दीन किया और अपने कान छिदवा लिए (यशायाह 53:10) और क्रूस पर मृत्यु तक पिता की इच्छा पूरी की और वह एक आज्ञाकारी दास है जिसने अपने विषय में लिखी हुई सारी बातें पूरी की हैं (यूहन्ना 19:28-30) यदि हम यीशु के समान दास बनें और उसकी आज्ञाओं को मानें, तो हम उसके प्रेम में बने रहेंगे। और यदि हम उसके प्रेम में बने रहेंगे, तो एक-दूसरे से अन्त तक प्रेम कर पाएंगे।

इसके अलावा, जैसे यीशु ने अपने पिता की आज्ञाओं का पालन किया और परमेश्वर के प्रेम में बने रहे, वैसे ही हमें भी यीशु के प्रेम में बने रहना चाहिए और उनकी आज्ञाओं का पालन करना चाहिए। जैसे पिता ने यीशु से प्रेम किया, वैसे ही यीशु ने हमसे प्रेम किया (यूहन्ना 13:34) यीशु ने जैसे हमें प्रेम किया वैसे यदि हम आपस में भाई चारे के प्रेम में रहना है तो कान में छेद डाले हुए दास के मानिंद रहना चाइये। (पतरस५:)नव युवको से कहा गया है की प्रचीनो के आधीन हो उसका यह मतलब है की प्रेम के अनुभव से भर कर सब के आधीन रह। (1 पतरस 2:18)) में कहा गया है की केवल नम्र और कोमल स्वामिओ के नहीं बल्कि कुटिल के भी आधीन रहे। ऐसे आधीन होने के लिए केवल एक ही झुंड से नहीं कहा गया बल्कि सभी लोग आपस में नम्र होकर दास बन कर आधीन होना है। मतलब की जो परमेश्वर के प्रेम से भरकर प्रेम में बना रहना चाहते है वो आपस में दास बन कर रहे। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को और वैसे ही दूसरा पहले को प्रेम करते हुए आपस में मानते हुए, ख्याल करते हुए, मदद करते हुए, सहते हुए दास बन कर ( कुरिन्थियों 13:4–8) प्रेम का असली मतलब को पूरा करते रहने की अवस्था।

एक उदाहरण: स्वर्ग में एक भोज होता है। वहाँ तरह तरह के स्वादिष्ट भोजन उपलब्ध है, पर सरे स्वर्गवासियों के हाथ के टखनो से बहुत लम्बे चम्मच बँधे हैं जिनसे वे अपने खुद के मुँह तक भोजन नहीं ला सकते। किंतु प्रेम में परिपूर्ण, दास बन के, भाईचारे के प्रेम से भरे हुए वेः उसकी परवाह नहीं करते है। सब ने आपस में एक दूसरे को भोजन वास्तु खिलते रहे इसीलिए आनंद के साथ भोज को अनुभव किये।

यीशु ने जिन से प्रेम रखा उन्हें अंत तक प्रेम रख ने के लिए उनका दास बने वैसे ही हम भी आपस में दास बन कर आज्ञा पालन करते हुए, सहन करते हुए, आदर करते हुए, मदद करते हुए जीवन बिताने से ससारक को दिखा सकेंगे ही हम यीशु के चेले है।

हमारे पिता परमेश्वर हमें इस अनुभव के योग्य बनाए, हमें अपनी आशीष से भर दे, और अपने पवित्र नाम को हममें महिमित करे।