अनन्त जीवन का वृक्ष (प्रकाशितवाक्य 22:14)
प्रभु की स्तुति
अनन्त जीवन का वृक्ष
जब परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की, तो उसने मिट्टी से बने मनुष्य की नासिका में जीवन का श्वास फूँका (उत्पत्ति 2:7), और मनुष्य जीवित प्राणी बन गया। फिर वह जीवन में बढ़े, जीवन से भरपूर हो और अनन्त जीवन के साथ सदा जीवित रहे, इसके लिये परमेश्वर ने अदन की वाटिका में भूमि से जीवन का वृक्ष उगाया (उत्पत्ति 2:9; 3:22)। परन्तु पाप के कारण जब यह दैवीय जीवन मनुष्य से खो गया, तब उसमें जीवन न रहा, और वह जीवन में बढ़ने में असमर्थ हो गया। इसलिये (उत्पत्ति 3:24) परमेश्वर ने जीवन के वृक्ष का फल उससे रोक दिया। मनुष्य के लिये खोए हुए जीवन को लौटाने के लिये यीशु आया (यूहन्ना 10:10)। वह मनुष्य को जीवित और भरपूर जीवन वाला बनने में सहायता करता है। (रोमियों 6:3–5) इसके लिये, बपतिस्मा के द्वारा, जो मसीह की मृत्यु, गाड़े जाने और पुनरुत्थान के समान है, मनुष्य को जीवन की नयापन देता है। नया जीवन प्राप्त करनेवाले मनुष्य को आवश्यक अनुभवों को कलीसिया नामक वाटिका में देकर वह उसे (यूहन्ना 10:10) जीवन की परिपूर्णता और (यूहन्ना 6:27) अनन्त जीवन की ओर ले जाता है (यूहन्ना 11:25–26)। इस प्रकार यीशु मनुष्य को ऐसा बनाता है कि वह कभी न मरे।
यदि हम ध्यान से देखें, तो उत्पत्ति में अदन की वाटिका में दिखनेवाला मनुष्य और जीवन का वृक्ष, अनन्तकाल में भी (प्रकाशितवाक्य 22:14) नये यरूशलेम नामक पवित्र नगर में दिखाई देता है। इसलिये हम देख सकते हैं कि परमेश्वर की सृष्टि में केवल मनुष्य और जीवन का वृक्ष ही अनन्त हैं। इस कारण हम मनुष्य और जीवन के वृक्ष की तुलना कर के अध्ययन कर सकते हैं। यह हमें हमारे आत्मिक जीवन में जीवन की परिपूर्णता प्राप्त करने और अनन्त जीवन में पहुँचने की सहायता करेगा।
अनन्तकाल में जीवन का वृक्ष नदी के इस पार और उस पार हम देखते हैं (प्रकाशितवाक्य 22:1–2) जीवन के जल की नदी के किनारे पर है। यहेजकेल 47:7,12 में भी नदी के किनारे जीवन के वृक्ष के समान वृक्षों को खड़े हुए देखा जाता है। उत्पत्ति 2:9–10 में भी पढ़ते हैं कि जीवन के वृक्ष को सींचने के लिये नदी निकलती है। आत्मिक जीवन में हम भी जीवन के वृक्ष की तरह बढ़ने के लिये, यीशु ने यूहन्ना 7:37–39 में प्रतिज्ञा की है कि पवित्र आत्मा रूपी जीवन के जल की नदियाँ हमें दी जाएँगी। मसीही जीवन की शुरुआत मन-परिवर्तन और बपतिस्मा से होती है (प्रेरितों के काम 2:33,38) । इसके बाद, यीशु ने पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा पिता से पाकर हमें दी। यही पवित्र आत्मा हमें पोषण देता है और बढ़ाता है।
फिर जब हम जीवन के वृक्ष को देखते हैं (प्रकाशितवाक्य 22:1–2), तो वह फलवाला वृक्ष है। इस अनुभव को हम तीन प्रकार से समझ सकते हैं।
पहला: (यूहन्ना 15:16) यीशु ने हमें चुना और अपनी कलीसिया नामक वाटिका में लगाया ताकि हम फल लाएँ। इसलिये लूका 13:6–7 में दाख की बारी में लगाया हुआ अंजीर का वृक्ष जब फलविहीन पाया गया, तो उसे काट डालने को कहा गया। उसी प्रकार, ऐसा न हो की हम फलविहीन पाए जाये और काटे जाएँ। (यूहन्ना 15:2) दाखलता की हर डाली जो फल नहीं लाती, काटकर फेंक दी जाती है। इसलिये यदि हमें जीवन का वृक्ष बनना है, तो हमें फलवान होना होगा।
(उत्पत्ति 3:22) अगर ध्यान दिया जाये तो समझेंगे की जीवन का वृक्ष नहीं, पर उसके फल ही अनन्त जीवन देते हैं। जीवन के वृक्ष का फल से ही सदा जीवित रह सकेंग। यदि हम फलविहीन रहें, तो नित्यता में दिखाई दिए बिना (यूहन्ना 15:4–6; प्रकाशितवाक्य 20:15) अनन्त नरक की आग में डाल दिये जाएँगे। और हम फलवंत होना चाइये ऐसे कहते समय (मथि ३:१०) यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला कहता है की अच्छे फल देनेवाले वृक्ष काट कर आग में डाले जायेंगे। (मथि १२:३३-३५) वृक्ष अच्छा होने से ही फल भी अच्छा होग। फल से ही वृक्ष जाना जायेगा। इसीलिए बेकार फल देनेवाले वृक्ष भी काट कर आग में डेल जायेंगे। इसीलिए अच्छे मनुयष रह के अच्छे फल लाने वाले हो कर दिखे।
दूसरा: (यूहन्ना 15:16) हमें केवल फलवाले ही नहीं, परन्तु स्थायी फलवाले भी होना है। मरकुस 11:13 में अंजीर का वृक्ष था, परन्तु जब यीशु ने उसमे फल ढूंढा तब उस समय फल का मौसम नहीं था। इसलिए यीशु ने उसे शाप दिया और वह सूख गया। इसका अर्थ है कि हमें विशेष समय या परिस्थिति में ही नहीं, हर समय फलवाले और स्थायी फलवाले होना है। हम पानेवाले आत्मिक अनुभव-रूपी फलो को हर समय प्राप्तः करके और प्रगट करके जीना चाइये।
तीसरा: (प्रकाशितवाक्य 22:2; यहेजकेल 47:12) जीवन का वृक्ष महीने-महीने नया फल देता है, बारहों महीने अपने-अपने फल। वैसे ही हमें भी आत्मिक जीवन में जैसे-जैसे बढ़ते जाते है वैसे-वैसे नए-नए फल उत्पन्न करने चाहिए। (मत्ती 3:8) मन-परिवर्तन के योग्य फल लाओ ऐसे कहने से मन फिराने के दौरान (2 कुरिन्थियों 7:10–11) लिखे गए हुए फल। (गलातियों 3:27–28) बपतिस्मा के द्वारा सभी मसीह में एक हो कर देखने का अनुभव। (रोमियों 6:22) पाप से छुटकारा पाकर परमेश्वर के दास बन ने के द्वारा पवित्रता का फल पाते है। (गलातियों 5:22–23) पवित्र आत्मा का अभिषेक पाकर आत्मा के अगुवाई में चलते है तब आत्मा के फल उत्पन्न होते है। (इफिसियों 4:24) सत्य रूपी वचन के अनुसार जब जिथे है तब हमे धर्म और पवित्रता का फल प्रतपत होती है।
इस प्रकार, हर नए आत्मिक अनुभव से हमें नए फल मिलते रहना चाइये। ऐसे हम नए नए अनुभवों को प्राप्त करते रहना है तब भी पूर्व के फलों को भी संजोए रखना चाइये। तब हम श्रेष्ठगीत 7:14 की तरह अपने प्रिय यीशु के लिये पुराने और नये सब उत्तम फल सहेज कर रखने वाले बनते हैं।
(कुलुस्सियों 2:9; इफिसियों 4:12) मसीह में, जिसमें परमेश्वर की सारी परिपूर्णता सदेह वास करती है, हम भी मसीह की परिपूर्णता की डील डॉल तक बढ़ने में मदद होता हैं। (याकूब 5:7) हमारा परमेश्वर किसान के समान पृत्वी के बहुमूल्य फलों के लिये धीरज धरता है, और hum उत्तम रखनेवाले होकर हम बहुमूल्य बन कर अन्ततः हमें (मलाकी 3:17) अपनी निज सम्पत्ति बनाता है।
थोड़ा और ध्यान से पढ़ने से हम समझ सकते हैं की जीवन का वृक्ष पानी के पास लगाया गया है, इसलिए फलता-फूलता है। (यहेजकेल १९:१०) इसी तरह परमेश्वर ने हमें भी बहुत से जल के पास, उत्तम भूमि में लगाया है (यहेजकेल 17:5,8; 19:10; 31:5,7)। इसलिये हमें बढ़कर, वृक्ष बनकर शोभा के साथ (यहेजकेल 17:5–10) दीखते हुए सौ गुना फल देना है (लूका 8:8) ।
परन्तु हमें इस्राएलियों की तरह (यिर्मयाह 17:13) जीवते जल के सोते यहोवा को न छोड़ना चाहिए। क्योंकि, यह परमेश्वर ही है जिसने वृद्धि दी (1 कुरिन्थियों 3:6) । अन्यथा हम जो दाखलता है वह सूख जाएगी। इसलिए इससे बचने के लिये हमें कई बातों पर ध्यान देना है।
पहला: (यिर्मयाह 17:7–8; भजन संहिता 118:8–9; 146:3; 125:1) इन वचनो में जैसे देखते है की हम पानी के किनारे लगाए हुए और नदी किनारे जड़ पकडे हुए वृक्ष बन जाने के लिए यहोवा पर भरोसा रखना है और यहोवा को ही भरोसा बना रखना ह। मनुष्यो पर और प्रभुओ पर भरोसा करने से उत्तम है यहोवा पर भरोसा रखना। वेः हमारी मदद नहीं करेंगे इसीलिए हम परमेश्वर पर करेंगे ऐसा न हो। जो मनुष्य पर भरोसा रख के अपने ह्रदय में यहोवा से दूर हो जाते है वोः शापित है। (भजन संहिता २०:७) दूसरे चाहे किसी पर भरोसा रखे तो भी हम हमारे यहोवा का नाम को ऊँचा करेंगे ( भजन संहिता ११५:९-११) हमारी सहायक और ढाल होकर रहने वाले यहोवा पर भरोसा होना चाइये। (भजन संहिता १२५: १) ऐसे लोग ही स्थिर रहकर सीधे बढ़ सकेंग। (येरेमिया१७:७) किंतु हम फल देनेवाले बन ने के लिए केवल यहोवा पर ही भरोसा रखना चाहिए । (भजन संहिता ५२:८) पूरी तरह परमेश्वर पर ही भरोसा रखनेवाले होकर रहने से सदा पुष्टि पाई हुई वृक्षों के समान रहेंगे। (यरमिया 17:8 ) जब धूप होगी तब उसको न लगेगी, उसके पत्ते हरे रहेंगे, और सूखे वर्ष में भी उनके विषय में कुछ चिंता न होगी, क्यूंकि वह तब भी फलता रहेगा। इसीलिए हम अपने यहोवा परमेश्वर पर ही भरोसा रखे।
दूसरा: (भजन संहिता 1:1–3; 1 यूहन्ना 5:18) हमारे जीवन में दुष्टों की युक्ति पर न चलकर, थक कर पापियों के मार्ग में न ठहरकर और श्रमित होकर टट्टा करनेवालों के बैठक में न बैठकर अपने आप को संभालना है, ऐसे लोग परमेश्वर से जनने हुए है इसीलिए अपने आप को सँभालते ह। ऐसो के जीवन में पाप के खुशिया नहीं रहते है और वह परमेश्वर की व्यवस्था पर रात और दिन ध्यान करते हुए ख़ुशी मनाते है। इस प्रकार से अपने जीवन में परमेश्वर के वचन को मुख्यता देकर उसको ध्यान करते रहनेवाले ही नदी किनारे लगे हुए और पत्ते न मुरझाये जाने वाले होकर फलवन्त वृक्ष बनेंगे। (एजेकिअल 31:16) ऐसे पानी पीनेवाले श्रेष्ठ और उत्तम वृक्ष (यशायाह 66:13) नए येरूशलेम नामक नगर में जा कर तस्सली पाएंगे।
(उत्पत्ति 3:22-24) अदन वाटिका में मनुष्य ने जीवन का वृक्ष का फल को नष्ट करके उसमे कोई भागेदारी न रही। किंतु (प्रकाशितवाक्य 22:14) में हम देखते है की मनुष्य को उस जीवन के वृक्ष पर अधिकार होगा। इसीलिए उसे पाने के लिए इस दुनिया में जीते समय हम ध्यान रकने चाइये ऐसा तीसरा एक मुद्दा भी है। (प्रकाशितवाक्य 22:14) यदि हम अंग्रेजी और तमिल भाषा में पढ़ने से समाज सखेंगे की हम परमेश्वर के व्यवस्थाओ को मान ने चाइय। (मत्ती 7:21-27) गिरने बिना खड़े रहते हुए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के लिए यीशु के वचनो को मानकर करनेवाले होका रहना चाइये। इसीलिए हमारे जीवन में परमेश्वर पर ही भरोसा रखते हुए, उसके कलाम को रात और दिन ध्यान करते हुए, उसके अनुसार जीवन व्यतीत करते है इसीलिए फटाको से नगर में प्रवेश करने के लिए और जीवन का वृक्ष के अधिकारी बन पाएंगे।
(भजन 22:29) इस पृथ्वी पर पुष्टि से जी करके और नित्यता में जीवन के वृक्ष के अधिकारी बन कर उसके फलो को खाते हुए (उत्पति 3:22) सदा जीवित रहनेवाले होकर (प्रकाशितवाक्य 22:3) परमेश्वर की उपासना करेंगे।
परमेश्वर हम सबको उसके लिए मदद करे और आशीष करे।